सत्ता की भूख
देवनारायण साहू
⏩ हर कोई करता इस रश का पान, सत्ता की सुख बड़ी विरान।
सत्ता तो है आग का गाेला,बिना छुए ही सब हाे जाता खाख।।
सत्ता एक अनसुलझा रहस्य है हर व्यक्ति को आशा होती है कि उसको भी सत्ता का रसपान करने का सुअवसर मिले ! ताकि वह अपने स्वार्थ की पूर्ति कर सके |
तत्पश्चात वह अपने आप को वह उस समय सत्ता के मद में चुर सत्ता का दुरूपयोग करके उन लोगों को भूल कर जिन्होंने उसे सत्ता में बैठाया उनके बारे में बिना विचार करें, सत्ता जैसे रसगुल्ले के मिठास निरंतर रसपान करता रहा था, और करता रहा है |
उसने कभी भी ना किसी एक गाँव, एक व्यक्ति विशेष के लिए वह सत्ता में नहीं आता या उसे जब जब गद्दी मिला सबसे पहले वह अपने स्वार्थ की पुर्ती करने के लिए सबसे पहले अपने विकास के लिए हर कोशिश करता नजर आता है उसको और कोई नज़र नहीं आता, तो क्या हम यह समझे अगर हमें संपत्ति का विकास करना हो तो हम मंत्री के साथ या उनके जैसा पद ग्रहण कर चंद छोटेमोटे कार्यो का खाखा तैयार कर इस देश के सामने पेश कर दो और फिर इसका इतना प्रचार करो कि इसके अलावा कुछ भी नज़र ना आये| क्या आजकल ये सत्ता में जो खेल चल रहा है ।
आऔ हमारे साथ हम तुम्हारे सब काम बना देगे यह पैसा के बल का प्रयोग मात्र है जहाँ धन वहाँ सत्ता, और सत्ता है तो सबकुछ है | आज सत्ता उन लोगो की हाथों में है जो पुरे सिस्टम को चलाने का दावा किया करते हैं बस इतना फर्क रह गया है कि सरकार किसी भी पार्टी का हो सत्ता का रसपान करता है और करता रहेगा| लेकिन अब इसे भी समझना होगा कि वक्त के आगे सभी को हिसाब देना पड़ेगा चाहे वह कोई हो।
⏩ सत्ता तो रावन की भी छिन ली गइ, तुम किस जीज का गुमान करते हाे।
सबसे बड़ा मानव धर्म,मानव सेवा परमाे धर्म।
आज जो हालात हैं वो तो किसी से छुपा नही, सत्ता पाने के लिए यहाँ किसी का भी दल बदलते रहते है ईनकी इन दल बदलने की वजह से एक मताधिकार के अनमोल वोट का दुरूपयोग सदी से होता आ रहा है । इसे ही दलबदलू की उपाधी मिली हैं !
आज सत्ता की चाबी उसे भी मिल जाती हैं जो समाज मे न तो रहने लायक है तो फिर वो क्या किसी की सेवा का कोई भी कार्य भी नहीं करते वह अपने झोला व जेब भरने में ज्यादा मसगुल रहते हैं। आज वो सत्ता में बैठ कर क्या निती क्या अनिती वह व्यक्ति अपने आप को राजा समझने लगते है और हर वो बुरे काम करते हैं अपनी सत्ता की साख बनाये रखने के लिए अपना खुद का सामराज्य स्थापित करने के लिए भी वह नित प्रयास करता ही रहता और वह अपनी भुख मिटाने के लिए हर तरह के हतकंडे अपना कर चाहे उसे किसी का गला तक काटना भी पड़ीं तो वह पिछे
नही हटता है , न तो देश व समाज कि चिन्ता है उसे और ना ही किसी और की वह बस पैसा कमाना चाहता है और अपने लिए हर सुख सुविधा बटोरता जाता है और ऊल जुलूल हरकते कर के जुमलेबाजी मे पुरा डीग्री हासिल कर देश व समाज को गर्त मे ढकेल देता है।
और खुद की जान पे बन आति है तो वह अपने पालतु कुछ चापलुस व गिदड़ जैसे लोगो को साथ रख कर वह सत्ता के मद में चुर हो कर एक पागल हाथी के भांती अपने जीवन को काल के जाल मेँ समाता जाता है। वह देश काे भुखमरी, अपात काल जैसे हालात पैदा करना,देश काे अशिक्षा के गर्त मे ढकेला जा रहा है,लचर व्यवस्था के चलते देश को अपाहीज बना कर रख देता है। आज देश हित मे अपने विचार व आगे रख कर
छाेटाे सा योगदान इस समाज व समाज के ठेकेदारो के इरादाें काे निस्तानाबुत करने के जुगत में आज से ही कार्य करने हाेगे इन सब दलालों हटा कर देश के उन्नतिशील,प्रगति शील, विचारो का हो ना बहुत आवश्यक्ता है।
बस इस आशा और विश्वास के साथ अपने विचार काे यही विराम देते हुए । इस कड़ी काे आगे और भी लेख लिखतें रहुँगा। गलतियो पे छमा चाहता हूँ।
सत्ता का सुख पाना है ताे, कराे कुछ काज ऐसा ।
सभी का भला हाे, सभी काे मिले न्याय ।।
देवनारायण साहू
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