॥ पूछता नाम अपना ॥

 



                    ॥ पूछता नाम अपना ॥


देख लाे यहां भी -वहां भी, काेई उतरा ताे नही जमीं पर से,

पता लगा है आया था वह फुरसत में यहां पर |


लगता है आया था किसी राज़ काे दफन करने, उसके पाव के निशान आज भी है जरा रेत में उभरी हुऐ |


देखाे जरा संभल कर रहना, क्या पता तुम्हारा पता हि ना पुछ ले काेई बहाना बना कर,वक्त नही है उसके पास अपने ही घर में जाने काे |


जरा सी देर वही रूक गया वह, शायद उसे कुछ याद आ गया,शायद उसे अपने इस सफर के हमसफर की याद आ गया |


वह  ना जाने किस कशमकश में था, अपने ही नाम काे 

मिटाता लिख कर बार-बार ,शायद तलाश थी उसे खुद के फना हुऐ नाम की |



संभाल कर रखने की काेशीश में गिरा दिये वे महल,जाे तेरे रेत के बनाये थे,  तेरे बनाये महल महज ही उस पानी के बुलबुले की तरह थे जाे पल मे गायब हाे जाते है |


उसके पास शायद वक्त नही था,वरना यू ही ठाेकरें खाता नही फिरता यहां से वहां , ढुढते अपने ही नाम के शब्द और अक्षर  |


जब उसे मिला वह नाम ताे साेचता है, क्या यही नाम था मेरा, मिट गये थे वाे निशान, जब उसने अपना हाथ खाेला |


काेई पता ताे बता दे जरा उसके नाम का, नज़र मे हाे ताे |

नज़र से ओझल हाे कर उड़ गया वह आसमान पर पक्षी बन कर | 


देख लाे यहां भी -वहां भी, काेई उतरा ताे नही जमीं पर से,

पता लगा है आया था वह फुरसत में यहां पर |


                      रचना - देवनारायण साहू


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