देवनारायण साहू


चलो उस नगर जो अपना हो सभी का सपना हो,न हो कहीं भी द्वैश सी भावना किसी भी के अन्दर, रहे हम वहां निश्छल,निर्मल और न ओझल, अपना नगर हो स्वच्छ वातावरण से सराबोर।
रहते हो वहां भी हंसते हुए फुल की तरह चैहरे न बसें हो वहां नफरतों के आशियानों पर लोग, छांव हो सच्चाई के वृक्षों का जिनमें लगें हो फूल गुलमोहर का। और चले उस प्रेम के साथ ले कर हाथों में हाथ हम चले वहां जहां से आती हो मधुर सुगंध उन गलियारों से
जल में हो मीन, नभ में दिनकर, आति रहे सबनम बस थम-थम कर। रहे नगर में मौसम सुहाना जैसे वटवृक्ष से कुहू-कुहू की रट लगाये कोयल दिवाना ।
रौशन हो हर गली, चौंक, चौराहा जहां पर जलते हो दीऐ प्रेमदीप के, चमकता रहे वह हर गलियारा जहां पर जान पे खेल कर रौशन करता जुगनू बेचारा ।
गलियों से घराें में जाती है आवाजें ले लाे हरें भरें, रशिलें, आम ताजे व रशभरी, एक बार चखोगे हमेशा याद रखोगे, सेहतमंद बने रहोगें ।
चलों उस नगर जहां न कुचले जाते हो
मां के प्यार को, पिता के दुलार को, बहन के अधिकार को, बहन को भी भाई की तरह समान व्यवहार को।

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चलो उस नगर काे उस डगर जहाँ फुलाें सा हृदय हाे,सबके रहते हाे दिलो में सभी के लिए प्यार और विस्वास,और उन गलियो में मिठा सा थाेडा तिखा सा थाेडी खट्टी-मिठी और थाेडी नमकीन भरा माहौल उस पर थाेडी नाेक – झाेक और फिर उसके बाद हाे हसीं ठिठाेली के साथ कुछ अनसुने उन दादीयाें के थाेडे डरालने, थाेडे सूझ -बूझ व हिम्मत वाले कहानियाँ । चलाे उस नगर….

चलों उस नगर में जहाँ लोग अपनी जातिवाद विचार काे बदल कर सभी अनेकता में ऐकता के सुत्र में बंध कर एक अलग नगर,शहर,राज्य, देश बनाये। और लाेकतंत्र की परिभाषा काे सच कर दे। जहाँ बाबा साहेब अंबेडकर के विचारें से,विवेकानंद के वैराग्य मय विचारो से, गांधी जी के अहिंषावादी विचाराें से, हम भी इनके विचाराें काे आत्मसात कर नई साेच का दुनिया बनाऐ। चेलाे उस नगर….


चलो उस नगर में जहाँ माँ के विस्वास पे खरा उतरकर माँ की हर हालात में सेवा करे उसके बच्चें। पिता के साथ कंधा से कंधा मिला कर करें वह हर काम तभी दुनिया में करेंगा अपना नाम । माँ के हाथाें के नरम-गरम राेटी व पकवान सभी परिवार में बटते हाे सामान। यही है स्वर्ग हमारा जीवन में सभी काे यही है सब कुछ खोना और पाना क्याेकी यही वाश करते है भगवान हर मनुष्य के अन्दर । आदत व्यवहार ही मनुष्य का साथी भी है और दुश्मन।

चलाे उस नगर जहां फुलो में हाे मधुर संगीत की महक,आती हाे शंख से मन माेहक धुन जिससे आत्मा भी तृप्त हाे जाये। सागर में हाे ऐसी शितलता की भगवान भी चकित रह जाये। मन की गती से हर काम हाे जाये।जहाँ आती हाे पुरे देश के पकवान और उनमें पडने वाली मसालाें का लाजवाब सुगंध । जहाँ सुरज की लाली, चाँद की ठंडक और ठंडी में ओश की शितलता का अलग ही अजुबा ।चलाे उस नगर…

चलाे उस नगर जहां हाे पुरे देश की भाषा की अपनी रंग,वेशभूषा, साहित्यिक,खान-पान, रिती- रिलीज़,संग में कपडे़ भी बड़े रंगीन, और संगीत की मधुर तान,कही आम के आचार,कही केले के पकवान, कही गर्मी मे ठंडे का अहसास,कही फलाें के अलग है अंदाज़, कही फूलाे के संग हाेती है हाेली के रंग,कही मधुर बंसी की धुन ताे वही सिता राम नाम के जयघोष। चलाे उस नगर….

              

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                           देवनारायण साहू

छोटा सा प्रयास है आशा है आप सभी को अच्छा लगेगा। हमारी और भी रचना है आशा है वाे भी आपकों पसंद आयेगी...