हिन्दी भाषा(साहित्‍य)

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आज हिन्दी भाषा न केवल भाषा है। हमारी मात्रभाषा भी है आज चाराेे तरफ हमारी भाषा का प्रचार और प्रसार पुरे विश्व में आकाश में चमकते सुरज के समानांतर गति से अधिक लोगों द्वारा बोली जाती है। आज मनुष्य द्वारा बोली जाने भाषा "हिन्दी बोलियों" की वजह से कई विदेशी देशों से अधिक लोगों ने इसी भाषा संस्कृतिक स्वरूप के कारण भारत देश देश कालान्तर तक पूरे विश्व में हिन्दुराष्ट्र के पदवी लिऐ आज अपनी  वाहवाही लूट रहा है। आगे भी इसकी ख्याती पूरे विश्व में फैला हुआ है।

आज हम इसी हिन्दी भाषा के विषय में थाेडा विचाराधीन लेख आपके साथ बाटना चाहते है। 

हन्दी जिसके मानकीकृत रूप को मानक हिंदी कहा जाता है, विश्व की एक प्रमुख भाषा है एवं भारत की एक राजभाषा है। केन्द्रीय स्तर पर भारत में दूसरी आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है। यह हिन्दुस्तानी भाषा की एक मानकीकृत रूप है जिसमें  के तत्सम तथा तद्भव शब्दों का प्रयोग अधिक है और अरबी-फ़ारसी शब्द कम हैं। हिन्दी संवैधानिक रूप से भारत की राजभाषा और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। हिन्दी भारत राष्ट्रभाषा नहीं है क्योंकि भारत के संविधान में किसी भी भाषा को ऐसा दर्जा नहीं दिया गया है।एथनोलॉग के अनुसार हिन्दी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार यह विश्व की दस शक्तिशाली भाषाओं में से एक है

हिन्दी
हिंदी या मानक हिंदी
Hindi.svg
शब्द "हिन्दी"
देवनागरी में
बोलने का  स्थान भारत
एवं
नेपाल, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान (हिंदुस्तानी)
तिथि / काल १९९१
मातृभाषी वक्ता ४२ करोड़ ६० लाख (२००१) कुल जनसंख्या का ४१.०३%[1]
द्वितीय भाषा: १२ करोड़ (१९९९)[1]
भाषा परिवार
लिपि देवनागरी
राजभाषा मान्यता
औपचारिक मान्यता None
नियंत्रक संस्था केंद्रीय हिंदी निदेशालय[2]
भाषा कोड
आइएसओ 639-1 hi
आइएसओ 639-2 hin
आइएसओ 639-3 hin
भाषाविद् सूची hin-hin
भाषावेधशाला 59-AAF-qf

भारत की जनगणना २०११ में 57.1% भारतीय जनसंख्या हिन्दी जानती है। जिसमें से 43.63% भारतीय लोगों ने हिन्दी को अपनी मूल भाषा या मातृभाषा घोषित किया था। इसके अतिरिक्त भारत, पाकिस्तान और अन्य देशों में 14 करोड़ 10 लाख लोगों द्वारा बोली जाने वाली उर्दू, व्याकरण के आधार पर हिन्दी के समान है, एवं दोनों ही हिन्दुस्तानी भाषा की परस्पर-सुबोध्य रूप हैं। एक विशाल संख्या में लोग हिन्दी और उर्दू दोनों को ही समझते हैं। भारत में हिन्दी, विभिन्न भारतीय राज्यों की 14 आधिकारिक भाषाओं और क्षेत्र की बोलियों का उपयोग करने वाले लगभग 1 अरब लोगों में से अधिकांश की दूसरी भाषा है। हिन्दी भारत में सम्पर्क भाषा का कार्य करती है और कुछ हद तक पूरे भारत में सामान्यतः एक सरल रूप में समझी जानेवाली भाषा है। कभी-कभी 'हिन्दी' शब्द का प्रयोग नौ भारतीय राज्यों के सन्दर्भ में भी उपयोग किया जाता है, जिनकी आधिकारिक भाषा हिन्दी है और हिन्दी भाषी बहुमत है, अर्थात् बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखण्ड, जम्मू और कश्मीर (२०२० से) उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली का।

हिन्दी और इसकी बोलियाँ सम्पूर्ण भारत के विविध राज्यों में बोली जाती हैं। भारत और अन्य देशों में भी लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम, नेपाल और संयुक्त अरब अमीरात में भी हिन्दी या इसकी मान्य बोलियों का उपयोग करने वाले लोगों की बड़ी संख्या मौजूद है। फरवरी 2019 में अबू धाबी में हिन्दी को न्यायालय की तीसरी भाषा के रूप में मान्यता मिली।

'देशी', 'भाखा' (भाषा), 'देशना वचन' (विद्यापति), 'हिन्दवी', 'दक्खिनी', 'रेखता', 'आर्यभाषा' (दयानन्द सरस्वती), 'हिन्दुस्तानी', 'खड़ी बोली','भारती' आदि हिन्दी के अन्य नाम हैं जो विभिन्न ऐतिहासिक कालखण्डों में एवं विभिन्न सन्दर्भों में प्रयुक्त हुए हैं। हिन्दी, यूरोपीय भाषा-परिवार के अन्दर आती है। ये हिन्द ईरानी शाखा की हिन्द आर्य उपशाखा के अन्तर्गत वर्गीकृत है।

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नामोत्पत्ति

हिन्दी शब्द का सम्बन्ध संस्कृत शब्द 'सिन्धु' से माना जाता है। 'सिन्धु' सिन्धु नदी को कहते थे और उसी आधार पर उसके आस-पास की भूमि को सिन्धु कहने लगे। यह सिन्धु शब्द ईरानी में जाकर ‘हिन्दू’, हिन्दी और फिर ‘हिन्द’ हो गया। बाद में ईरानी धीरे-धीरे भारत के अधिक भागों से परिचित होते गए और इस शब्द के अर्थ में विस्तार होता गया तथा हिन्द शब्द पूरे भारत का वाचक हो गया। इसी में ईरानी का ईक प्रत्यय लगने से (हिन्द+ईक) ‘हिन्दीक’ बना जिसका अर्थ है ‘हिन्द का’। यूनानी शब्द ‘इण्डिका’ या लैटिन 'इण्डेया' या अंग्रेजी शब्द ‘इण्डिया’ आदि इस ‘हिन्दीक’ के ही दूसरे रूप हैं। हिन्दी भाषा के लिए इस शब्द का प्राचीनतम प्रयोग शरफ़ुद्दीन यज्दी’ के ‘जफ़रनामा’(1424) में मिलता है।

प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन ने अपने "हिन्दी एवं उर्दू का अद्वैत" शीर्षक आलेख में हिन्दी की व्युत्पत्ति पर विचार करते हुए कहा है कि ईरान की प्राचीन भाषा अवेस्ता में 'स्' ध्वनि नहीं बोली जाती थी बल्कि 'स्' को 'ह्' की तरह बोला जाता था। जैसे संस्कृत शब्द 'असुर' का अवेस्ता में सजाति समकक्ष शब्द 'अहुर' था। अफ़गानिस्तान के बाद सिन्धु नदी के इस पार हिन्दुस्तान के पूरे इलाके को प्राचीन फ़ारसी साहित्य में भी 'हिन्द', 'हिन्दुश' के नामों से पुकारा गया है तथा यहाँ की किसी भी वस्तु, भाषा, विचार को विशेषण के रूप में 'हिन्दीक' कहा गया है जिसका मतलब है 'हिन्द का' या 'हिन्द से'। यही 'हिन्दीक' शब्द अरबी से होता हुआ ग्रीक में 'इण्डिके', 'इण्डिका', लैटिन में 'इण्डेया' तथा अंग्रेजी में 'इण्डिया' बन गया। अरबी एवं फ़ारसी साहित्य में भारत (हिन्द) में बोली जाने वाली भाषाओं के लिए 'ज़बान-ए-हिन्दी' पद का उपयोग हुआ है। भारत आने के बाद अरबी-फ़ारसी बोलने वालों ने 'ज़बान-ए-हिन्दी', 'हिन्दी ज़बान' अथवा 'हिन्दी' का प्रयोग दिल्ली-आगरा के चारों ओर बोली जाने वाली भाषा के अर्थ में किया।

भाषाई उत्पत्ति और इतिहास

हिन्‍दी भाषा का इतिहास लगभग एक सहस्र वर्ष पुराना माना गया है। हिन्‍दी भाषा व साहित्‍य के जानकार अपभ्रंश की अन्तिम अवस्‍था 'अवहट्ठ' से हिन्‍दी का उद्भव स्‍वीकार करते हैं। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने इसी अवहट्ठ को 'पुरानी हिन्दी' नाम दिया।

अपभ्रंश की समाप्ति और आधुनिक भारतीय भाषाओं के जन्मकाल के समय को संक्रान्तिकाल कहा जा सकता है। हिन्दी का स्वरूप शौरसेनी और अर्धमागधी अपभ्रंशों से विकसित हुआ है। 1000 ई॰ के आसपास इसकी स्वतन्त्र सत्ता का परिचय मिलने लगा था, जब अपभ्रंश भाषाएँ साहित्यिक सन्दर्भों में प्रयोग में आ रही थीं। यही भाषाएँ बाद में विकसित होकर आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के रूप में अभिहित हुईं। अपभ्रंश का जो भी कथ्य रूप था - वही आधुनिक बोलियों में विकसित हुआ।

अपभ्रंश के सम्बन्ध में ‘देशी’ शब्द की भी बहुधा चर्चा की जाती है। वास्तव में ‘देशी’ से देशी शब्द एवं देशी भाषा दोनों का बोध होता है। प्रश्न यह कि देशीय शब्द किस भाषा के थे ? भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में उन शब्दों को ‘देशी’ कहा है ‘जो संस्कृत के तत्सम एवं सद्भव रूपों से भिन्न है। ये ‘देशी’ शब्द जनभाषा के प्रचलित शब्द थे, जो स्वभावत: अप्रभंश में भी चले आए थे। जनभाषा व्याकरण के नियमों का अनुसरण नहीं करती, परन्तु व्याकरण को जनभाषा की प्रवृत्तियों का विश्लेषण करना पड़ता है, प्राकृत-व्याकरणों ने संस्कृत के ढाँचे पर व्याकरण लिखे और संस्कृत को ही प्राकृत आदि की प्रकृति माना। अतः जो शब्द उनके नियमों की पकड़ में न आ सके, उनको देशी संज्ञा दी गयी।

शैलियाँ

भाषाशास्त्र के अनुसार हिन्दी के चार प्रमुख रूप या शैलियाँ हैं :

  • (1) मानक हिन्दी - हिन्दी का मानकीकृत रूप, जिसकी लिपि देवनागरी है। इसमें संस्कृत भाषा के कई शब्द है, जिन्होंने फ़ारसी और अरबी के कई शब्दों की जगह ले ली है। इसे शुद्ध हिन्दी भी कहते हैं। आजकल इसमें अंग्रेजी के भी कई शब्द आ गये हैं (विशेष तौर पर बोलचाल की भाषा में)। यह खड़ीबोली पर आधारित है, जो दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों में बोली जाती थी।
  • (2) दक्खिनी - उर्दू-हिन्दी का वह रूप जो हैदराबाद और उसके आसपास की जगहों में बोला जाता है। इसमें फ़ारसी-अरबी के शब्द उर्दू की अपेक्षा कम होते हैं।
  • (3) रेख्ता - उर्दू का वह रूप जो शायरी में प्रयुक्त होता था।
  • (4) उर्दू - हिन्दवी का वह रूप जो देवनागरी लिपि के बजाय फ़ारसी-अरबी लिपि में लिखा जाता है। इसमें संस्कृत के शब्द कम होते हैं, और फ़ारसी-अरबी के शब्द अधिक। यह भी खड़ीबोली पर ही आधारित है।

हिन्दी और उर्दू दोनों को मिलाकर हिन्दुस्तानी भाषा कहा जाता है। हिन्दुस्तानी मानकीकृत हिन्दी और मानकीकृत उर्दू के बोलचाल की भाषा है। इसमें शुद्ध संस्कृत और शुद्ध फ़ारसी-अरबी दोनों के शब्द कम होते हैं और तद्भव शब्द अधिक। उच्च हिन्दी भारतीय संघ की राजभाषा है (अनुच्छेद 343, भारतीय संविधान)। यह इन भारतीय राज्यों की भी राजभाषा है : उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, उत्तरांचल, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली। इन राज्यों के अतिरिक्त महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिम बंगाल, पंजाब और हिन्दी भाषी राज्यों से लगते अन्य राज्यों में भी हिन्दी बोलने वालों की अच्छी संख्या है। उर्दू पाकिस्तान की और भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर की राजभाषा है, इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना और दिल्ली में द्वितीय राजभाषा है। यह लगभग सभी ऐसे राज्यों की सह-राजभाषा है; जिनकी मुख्य राजभाषा हिन्दी है।

हिन्दी एवं उर्दू

भाषाविद हिन्दी ब्लॉग एवं उर्दू को एक ही भाषा समझते है। हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और शब्दावली के स्तर पर अधिकांशत: संस्कृत के शब्दों का प्रयोग करती है। उर्दू, नास्तिलिक लिपि में लिखी जाती है और शब्दावली के स्तर पर फ़ारसी और अरबी भाषाओं का प्रभाव अधिक है। हालाँकि व्याकरणिक रूप से उर्दू और हिन्दी में कोई अन्तर नहीं है मगर कुछ विशेष क्षेत्रों में शब्दावली के स्रोत (जैसा कि ऊपर लिखा गया है) में अन्तर है। कुछ विशेष ध्वनियाँ उर्दू में अरबी और फ़ारसी से ली गयी हैं और इसी प्रकार फ़ारसी और अरबी की कुछ विशेष व्याकरणिक संरचनाएँ भी प्रयोग की जाती हैं। उर्दू और हिन्दी को खड़ीबोली की दो आधिकारिक शैलियाँ हैं।

मानकीकरण

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से हिन्दी और देवनागरी के मानकीकरण की दिशा में निम्नलिखित क्षेत्रों में प्रयास हुये हैं :-

बोलियाँ

हिन्दी का क्षेत्र विशाल है तथा हिन्दी की अनेक बोलियाँ (उपभाषाएँ) हैं। इनमें से कुछ में अत्यन्त उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना भी हुई है। ऐसी बोलियों में ब्रजभाषा और अवधी प्रमुख हैं। ये बोलियाँ हिन्दी की विविधता हैं और उसकी शक्ति भी। वे हिन्दी की जड़ों को गहरा बनाती हैं। हिन्दी की बोलियाँ और उन बोलियों की उपबोलियाँ हैं जो न केवल अपने में एक बड़ी परम्परा, इतिहास, सभ्यता को समेटे हुए हैं वरन स्वतन्त्रता संग्राम, जनसंघर्ष, वर्तमान के बाजारवाद के विरुद्ध भी उसका रचना संसार सचेत है।

हिन्दी की बोलियों में प्रमुख हैं- अवधी, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बुन्देली, बघेली, भोजपुरी, हरयाणवी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, कुमाउँनी, मगही आदि। किन्तु हिन्दी के मुख्य दो भेद हैं - पश्चिमी हिन्दी तथा पूर्वी हिन्दी।

लिपि

हिन्दी को देवनागरी लिपि में लिखा जाता है। इसे नागरी के नाम से भी जाना जाता है। देवनागरी में 11 स्वर और 33 व्यंजन हैं। इसे बाईं से दाईं ओर लिखा जाता है।

शब्दावली

हिन्दी शब्दावली में मुख्यतः चार वर्ग हैं।

  • तत्सम शब्द- ये वे शब्द हैं जिनको संस्कृत से बिना कोई रूप बदले ले लिया गया है। जैसे अग्नि, दुग्ध दन्त, मुख। (परन्तु हिन्दी में आने पर ऐसे शब्दों से विसर्ग का लोप हो जाता है जैसे संस्कृत 'नामः' हिन्दी में केवल 'नाम' हो जाता है।
  • तद्भव शब्द- ये वे शब्द हैं जिनका जन्म संस्कृत या प्राकृत में हुआ था, लेकिन उनमें बहुत ऐतिहासिक बदलाव आया है। जैसे— आग, दूध, दाँत, मुँह।
  • देशज शब्द- देशज का अर्थ है - 'जो देश में ही उपजा या बना हो'। तो देशज शब्द का अर्थ हुआ जो न तो विदेशी भाषा का हो और न किसी दूसरी भाषा के शब्द से बना हो। ऐसा शब्द जो न संस्कृत का हो, न संस्कृत-शब्द का अपभ्रंश हो। ऐसा शब्द किसी प्रदेश (क्षेत्र) के लोगों द्वारा बोल-चाल में य़ों ही बना लिया जाता है। जैसे- खटिया, लुटिया

जिस हिन्दी में अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी के शब्द लगभग पूर्ण रूप से हटा कर तत्सम शब्दों को ही प्रयोग में लाया जाता है, उसे "शुद्ध हिन्दी" या "मानकीकृत हिन्दी" कहते हैं।

हिन्दी स्वनविज्ञान

देवनागरी लिपि में हिन्दी की ध्वनियाँ इस प्रकार हैं :

स्वर

ये स्वर आधुनिक हिन्दी (खड़ीबोली) के लिये दिये गये हैं।

वर्णाक्षर “प” के साथ मात्रा आईपीए उच्चारण "प्" के साथ उच्चारण ISO समतुल्य अंग्रेज़ी समतुल्य
/ ə: / / pə: / a बीच का मध्य प्रसृत स्वर
पा / ɑ: / / pɑ: / ā दीर्घ विवृत पश्व प्रसृत स्वर
पि / ɪ / / pɪ / i ह्रस्व संवृत अग्र प्रसृत स्वर
पी / i: / / pi: / ī दीर्घ संवृत अग्र प्रसृत स्वर
पु / ʊ / / pʊ / u ह्रस्व संवृत पश्व वर्तुल स्वर
पू / u: / / pu: / ū दीर्घ संवृत पश्व वर्तुल स्वर
पे / e: / / pe: / e दीर्घ अर्धसंवृत अग्र प्रसृत स्वर
पै / ɛ: / / pɛ: / ai दीर्घ लगभग-विवृत अग्र प्रसृत स्वर
पो / ο: / / pο: / o दीर्घ अर्धसंवृत पश्व वर्तुल स्वर
पौ / ɔ: / / pɔ: / au दीर्घ अर्धविवृत पश्व वर्तुल स्वर
पॅ / ɛ / / pɛ / ê ह्रस्व अर्धविवृत अग्र प्रसृत स्वर

इसके अलावा हिन्दी और संस्कृत में ये वर्णाक्षर भी स्वर माने जाते हैं :

व्यंजन

जब किसी स्वर प्रयोग ना हो तो वहाँ पर डिफ़ॉल्ट रूप से 'अ' स्वर माना जाता है। स्वर के ना होना व्यंजन के नीचे हलन्त्‌ या विराम लगाके दर्शाया जाता है। जैसे क्‌ /k/, ख्‌ /kʰ/, ग्‌ /g/ और घ्‌ /gʱ/।

स्पर्श (प्लोसिव)

अल्पप्राण
अघोष
महाप्राण
अघोष
अल्पप्राण
घोष
महाप्राण
घोष
नासिक्य
कण्ठ्य / kə /
/ khə /
/ gə /
/ gɦə /
/ ŋə /
तालव्य / tʃə /
/tʃhə/
/ dʒə /
/ dʒɦə /
/ ɲə /
मूर्धन्य / ʈə /
/ ʈhə /
/ ɖə /
/ ɖɦə /
/ ɳə /
दन्त्य / t̪ə /
/ t̪hə /
/ d̪ə /
/ d̪ɦə /
/ nə /
ओष्ठ्य / pə /
/ phə /
/ bə /
/ bɦə /
/ mə /
स्पर्शरहित (नॉन-प्लोसिव)

तालव्य मूर्धन्य दन्त्य/
वर्त्स्य
कण्ठोष्ठ्य/
काकल्य
अन्तस्थ / jə /
/ rə /
/ lə /
/ ʋə /
ऊष्म/
संघर्षी
/ ʃə /
/ ʂə /
/ sə /
/ ɦə /
ध्यातव्य

विदेशी ध्वनियाँ

ये ध्वनियाँ मुख्यत: अरबी और फ़ारसी भाषाओं से लिये गये शब्दों के मूल उच्चारण में होती हैं। इनका स्रोत संस्कृत नहीं है। देवनागरी लिपि में ये सबसे करीबी देवनागरी वर्ण के नीचे बिन्दु (नुक़्ता) लगाकर लिखे जाते हैं।

वर्णाक्षर
(
आईपीए उच्चारण)
उदाहरण वर्णन
क़ (/ q /) क़त्ल अघोष अलिजिह्वीय स्पर्श
ख़ (/ x /) ख़ास अघोष अलिजिह्वीय या कण्ठ्य संघर्षी
ग़ (/ ɣ /) ग़ैर घोष अलिजिह्वीय या कण्ठ्य संघर्षी
फ़ (/ f /) फ़र्क अघोष दन्त्यौष्ठ्य संघर्षी
ज़ (/ z /) ज़ालिम घोष वर्त्स्य संघर्षी

व्याकरण

अन्य सभी भारतीय भाषाओं की तरह हिन्दी में भी कर्ता-कर्म-क्रिया वाला वाक्यविन्यास है। हिन्दी में दो लिंग होते हैं — पुल्लिंग और स्त्रीलिंग। नपुंसक वस्तुओं का लिंग भाषा परम्परानुसार पुल्लिंग या स्त्रीलिंग होता है। क्रिया के रूप कर्ता के लिंग पर निर्भर करता है। हिन्दी में दो वचन होते हैं — एकवचन और बहुवचन। क्रिया वचन-से भी प्रभावित होती है। विशेषण विशेष्य-के पहले लगता है।

कारक दर्शानेवाले परसर्ग
कारक परसर्ग उदाहरण अंग्रेजी विवरण
कर्ता लड़का the boy क्रिया का करनेवाला/वाली व्यक्ति या चीज़
Ergative ने लड़के ने the boy perfective aspect में सकर्मक क्रियाओं के लिए वाक्यों का विषय चिह्नित करता है
कर्म को लड़के को the boy प्रत्यक्ष वास्तु को चिह्नित करता है।
सम्प्रदान to the boy प्रत्यक्ष वस्तु को चिह्नित करता है मगर वाक्य के विषय को भी दर्शा सकता है।[21]dative subjects; dative subject
करण से लड़के से with the boy क्रिया जिस वस्तु या जिस व्यक्ति के साथ की गयी है उसे चिह्नित करता है।
अपादान from the boy दिखता है कि कोई चीज किसी दुसरे चीज से दूर मूवमेंट है।
सम्बन्ध का लड़के का boy's दिखता है कि कोई चीज किसी दूसरी चीज़ की है।
Inessive में लड़के में in the boy दिखाता है कि कोई चीज किसी चीज के अन्दर है।
Adessive पे / पर लड़के पे on the boy दिखता है कि कोई चीज किसी चीज के ऊपर (सतह पर) है।
Terminative तक लड़के तक till the boy दिखता है कि कोई चीज दूसरे चीज तक गयी है।
Semblative सा लड़के सा boy-ish किसी चीज की दुसरे चीज से समानता दिखाता है।
लिंग और वचन सूचक
कारक
एकवचन बहुवचन एकवचन बहुवचन
कर्ता का के की
परोक्ष के

जनसांख्यिकी

भारत की जनगणना २०११ में 57.1% भारतीय आबादी हिन्दी जानती है। जिसमें से 43.63% भारतीय लोगों ने हिन्दी को अपनी मूल भाषा या मातृभाषा घोषित किया था। भारत के बाहर, हिन्दी बोलने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका में 8,63,077; मॉरीशस में 6,85,170; दक्षिण अफ़्रीका में 8,90,292; यमन में 2,32,760; युगांडा में 1,47,000; सिंगापुर में 5000; नेपाल में 8 लाख; जर्मनी में 30,000 हैं। न्यूजीलैंड में हिन्दी चौथी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है।

भारत में उपयोग

सम्पर्क भाषा

भिन्न-भिन्न भाषा-भाषियों के मध्य परस्पर विचार-विनिमय का माध्यम बनने वाली भाषा को सम्पर्क भाषा कहा जाता है। अपने राष्ट्रीय स्वरूप में ही हिन्दी पूरे भारत की सम्पर्क भाषा बनी हुई है। अपने सीमित रूप –प्रशासनिक भाषा के रूप – में हिन्दी व्यवहार में भिन्न भाषाभाषियों के बीच परस्पर सम्प्रेषण का माध्यम बनी हुई है। सम्पूर्ण भारतवर्ष में बोली और समझी जाने वाली (बॉलीवुड के कारण) देशभाषा हिन्दी है, यह राजभाषा भी है तथा सारे देश को जोड़ने वाली सम्पर्क भाषा भी।

राजभाषा

हिन्दी भारत की राजभाषा है। 14 सितम्बर 1949 को हिन्दी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया था।

राष्ट्रभाषा

प्रचलित मान्यता के विरुद्ध, हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा नहीं है, यद्यपि राष्ट्रभाषा के विषय में भारतीय संविधान में कुछ भी नहीं कहा गया है, ना ही संविधान में इसका कोई प्रावधान मिलता है। अपितु, स्वतन्त्रता आन्दोलन और स्वतन्त्रता के पश्चात, हिन्दी भाषा की बड़ी जनसंख्या को देखते हुए, तथा प्रशासनिक सरलता हेतु हिन्दी को भारत की "राष्ट्रभाषा" के रूप में मान्यता प्रदान करने का विचार भी किया गया, एवं इसकी माँग भी उठी। परन्तु भारत की भाषाई विविधता में केवल एक भाषा की बड़ी जनसंख्या के आधार पर ऊँचा स्थान देने को असंवैधानिक और अनुचित माना गया एवं इस प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया गया। वर्तमान में हिन्दी भाषा संविधान की 8 वीं अनुसूची में अंकित 22 मान्य भाषाओं में से एक है।

हिन्दी को राष्ट्रभाषा कहने के एक हिमायती महात्मा गांधी भी थे, जिन्होंने 29 मार्च 1918 को इन्दौर में आठवें हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। उस समय उन्होंने अपने सार्वजनिक उद्बोधन में पहली बार आह्वान किया था कि हिन्दी को ही भारत की राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिये। उन्होने यह भी कहा था कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। उन्होने तो यहाँ तक कहा था कि हिन्दी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। आजाद हिन्द फौज का राष्ट्रगान 'शुभ सुख चैन' भी "हिन्दुस्तानी" में था। उनका अभियान गीत 'कदम कदम बढ़ाए जा' भी इसी भाषा में था, परन्तु सुभाष चन्द्र बोस हिन्दुस्तानी भाषा के संस्कृतकरण के पक्षधर नहीं थे, अतः शुभ सुख चैन को जनगणमन के ही धुन पर, बिना कठिन संस्कृत शब्दावली के बनाया गया था।

पूर्वोत्तर भारत में

पूर्वोत्तर एक अहिन्दी भाषी क्षेत्र है। यहाँ हजारों वर्षों से असमीया भाषा सम्पर्क भाषा रही है। यहाँ असमीया के साथ ही बंगला, नेपाली, मणिपुरी, अंग्रेजी, खासी, गारो, निशी, आदि, मोनपा, वांग्चु, नागामीज, मिजो, काॅकबराक, लेप्चा, भुटिया और गिनते-गिनते इन आठ राज्यों में प्रायः 200 विभिन्न भाषायें एवं बोलियाँ प्रचलित हैं। अधिकांश भाषा एवं बोलियाँ तिब्बत-बर्मी परिवार की होने के कारण अलग से पहचानी जाती हैं। विविधताओं के कारण इस अंचल को ‘भाषाओं की प्रयोगशाला’ कहा जाता है।

पूर्वोत्तर भारत में अनेक जनजातियाँ निवास करती हैं। जिनकी अपनी-अपनी भाषाएँ तथा बोलियाँ हैं। इनमें बोड़ो, कछारी, जयन्तिया, कोच, त्रिपुरी, गारो, राभा, देउरी, दिमासा, रियांग, लालुंग, नागा, मिजो, त्रिपुरी, जामातिया, खासी, कार्बी, मिसिंग, निशी, आदी, आपातानी, इत्यादि प्रमुख हैं। पूर्वोत्तर की भाषाओं में से केवल असमिया, बोड़ो और मणिपुरी को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिला है। सभी राज्यों में हिन्दी भाषा का प्रयोग अधिकांश प्रवासी हिन्दी भाषियों द्वारा आपस में किया जाता है।

पूर्वोत्तर में हिन्दी का औपचारिक रूप से प्रवेश वर्ष 1934 में हुआ, जब महात्मा गांधी ‘अखिल भारतीय हरिजन सभा’ की स्थापना हेतु असम आये। उस समय गड़मूड़ (माजुली) के सत्राधिकार (वैष्णव धर्मगुरू) एवं स्वतन्त्रता सेनानी श्री श्री पीताम्बर देव गोस्वामी के आग्रह पर गांधी जी सन्तुष्ट होकर ‘बाबा राघव दास जी’ को हिन्दी प्रचारक के रूप में असम भेजा। वर्ष 1938 में ‘असम हिन्दी प्रचार समिति’ की स्थापना गुवाहाटी में हुई। यह समिति आगे चलकर ‘असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ बनी। आम लोगों में हिन्दी भाषा तथा साहित्य के प्रचार-प्रसार करने हेतु- प्रबोध, विशारद, प्रवीण, आदि परीक्षाओं का आयोजन इस समिति के द्वारा होता आ रहा है। पूर्वोत्तर भारत में हिन्दी की स्थिति दिनों-दिन सबल होती जा रही है और यह सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। हिन्दी का प्रचार-प्रसार तथा उसकी लोकप्रियता एवं व्यावहारिकता टी.वी. (धारावाहिक, विज्ञापन), सिनेमा, आकाशवाणी, पत्रकारिता, विद्यालय, महाविद्यालय तथा उच्च शिक्षा में हिन्दी भाषा के प्रयोग द्वारा बढ़ रही है।

भारत के बाहर

सन् 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आँकड़े मिलते थे, उनमें हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था। सन् 1997 में 'सैंसस ऑफ़ इण्डिया' का भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ प्रकाशित होने तथा संसार की भाषाओं की रिपोर्ट तैयार करने के लिए यूनेस्को द्वारा सन् 1998 में भेजी गई यूनेस्को प्रश्नावली के आधार पर उन्हें भारत सरकार के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक प्रोफेसर महावीर सरन जैन द्वारा भेजी गई विस्तृत रिपोर्ट के बाद अब विश्व स्तर पर यह स्वीकृत है कि मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से संसार की भाषाओं में चीनी भाषा के बाद हिन्दी का दूसरा स्थान है। चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्या हिन्दी भाषा से अधिक है किन्तु चीनी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा सीमित है। अंग्रेजी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा अधिक है किन्तु मातृभाषियों की संख्या अंग्रेजी भाषियों से अधिक है।

विश्वभाषा बनने के सभी गुण हिन्दी में विद्यमान हैं। बीसवीं सदी के अन्तिम दो दशकों में हिन्दी का अन्तरराष्ट्रीय विकास बहुत तेजी से हुआ है।हिन्दी एशिया के व्यापारिक जगत् में धीरे-धीरे अपना स्वरूप बिम्बित कर भविष्य की अग्रणी भाषा के रूप में स्वयं को स्थापित कर रही है। वेब, विज्ञापन, संगीत, सिनेमा और बाजार के क्षेत्र में हिन्दी की माँग जिस तेजी से बढ़ी है वैसी किसी और भाषा में नहीं। विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों तथा सैकड़ों छोटे-बड़े केन्द्रों में विश्वविद्यालय स्तर से लेकर शोध स्तर तक हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था हुई है। विदेशों में 25 से अधिक पत्र-पत्रिकाएँ लगभग नियमित रूप से हिन्दी में प्रकाशित हो रही हैं। यूएई के 'हम एफ़-एम' सहित अनेक देश हिन्दी कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं, जिनमें बीबीसी, जर्मनी के डॉयचे वेले, जापान के एनएचके वर्ल्ड और चीन के चाइना रेडियो इंटरनेशनल की हिन्दी सेवा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

दिसम्बर 2016 में विश्व आर्थिक मंच ने 10 सर्वाधिक शक्तिशाली भाषाओं की जो सूची जारी की है उसमें हिन्दी भी एक है। इसी प्रकार 'कोर लैंग्वेजेज' नामक साइट ने 'दस सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाषाओं'में हिन्दी को स्थान दिया था। के-इण्टरनेशनल ने वर्ष 2017 के लिये सीखने योग्य सर्वाधिक उपयुक्त नौ भाषाओं में हिन्दी को स्थान दिया है।

हिन्दी का एक अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने और विश्व हिन्दी सम्मेलनों के आयोजन को संस्थागत व्यवस्था प्रदान करने के उद्देश्य से 11 फरवरी 2008 को विश्व हिन्दी सचिवालय की स्थापना की गयी थी। संयुक्त राष्ट्र रेडियो अपना प्रसारण हिन्दी में भी करना आरम्भ किया है। हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाये जाने के लिए भारत सरकार प्रयत्नशील है। अगस्त 2018 से संयुक्त राष्ट्र ने साप्ताहिक हिन्दी समाचार बुलेटिन आरम्भ किया है।

 आज हम इसी हिन्दी भाषा के विषय में थाेडा विचाराधीन लेख आपके साथ बाटना चाहते है।यही आशा के साथ यह मेरा छाेटाे सा प्रयास आपकाे  अच्छी जानकारी देने की कोशिश कर रहा हूँ आगे चल कर इस भाषा का प्रयोग द्वारा विश्व स्तर में विस्तार होता रहे। आपका साथ व आशिष युही बना रहे।

सत्ता की भूख

                        सत्ता की भूख                                        

                                               देवनारायण साहू

⏩ हर कोई करता इस रश का पान, सत्ता की सुख बड़ी विरान।
सत्ता तो है आग का गाेला,बिना छुए ही सब हाे जाता खाख।।      

          सत्ता एक अनसुलझा रहस्य है हर व्यक्ति को आशा होती है कि उसको भी सत्ता का रसपान करने का सुअवसर मिले ! ताकि वह अपने स्वार्थ की पूर्ति कर सके | 
तत्पश्चात वह अपने आप को वह उस समय सत्ता के मद में चुर सत्ता का दुरूपयोग करके उन लोगों को भूल कर जिन्होंने उसे सत्ता में बैठाया उनके बारे में बिना विचार करें, सत्ता जैसे रसगुल्ले के मिठास निरंतर रसपान करता रहा था, और करता रहा है | 
उसने कभी भी ना किसी एक गाँव, एक व्यक्ति विशेष के लिए वह सत्ता में नहीं आता या उसे जब जब गद्दी मिला सबसे पहले वह अपने स्वार्थ की पुर्ती  करने के लिए सबसे पहले अपने विकास के लिए हर कोशिश करता नजर आता है उसको और कोई नज़र नहीं आता, तो क्या हम यह समझे अगर हमें संपत्ति का विकास करना हो तो हम मंत्री के साथ या उनके जैसा पद ग्रहण कर चंद छोटेमोटे कार्यो का खाखा  तैयार कर इस देश के सामने पेश कर दो और फिर इसका इतना प्रचार करो कि इसके अलावा कुछ भी नज़र ना आये| क्या आजकल ये सत्ता में जो खेल चल रहा है । 
आऔ हमारे साथ हम तुम्हारे सब काम बना देगे यह पैसा के बल का प्रयोग मात्र है जहाँ धन वहाँ सत्ता, और सत्ता है तो सबकुछ है | आज सत्ता उन लोगो की हाथों में है जो पुरे सिस्टम को चलाने का दावा किया करते हैं बस इतना फर्क रह गया है कि सरकार किसी भी पार्टी का हो सत्ता का रसपान करता है और करता रहेगा| लेकिन अब इसे भी समझना होगा कि वक्त के आगे सभी को हिसाब देना पड़ेगा चाहे वह कोई हो।
सत्ता तो रावन की भी छिन ली गइ, तुम किस जीज का गुमान करते हाे।
सबसे बड़ा मानव धर्म,मानव सेवा परमाे धर्म।

आज जो हालात हैं वो तो किसी से छुपा नही, सत्ता पाने के लिए यहाँ किसी का भी दल बदलते रहते है ईनकी इन दल बदलने की वजह से एक मताधिकार के अनमोल वोट का दुरूपयोग सदी से होता आ रहा है । इसे ही दलबदलू की उपाधी मिली हैं ! 
  आज सत्ता की चाबी उसे भी मिल जाती हैं जो समाज मे न तो रहने लायक है तो फिर वो क्या किसी की सेवा का कोई भी कार्य भी नहीं करते वह अपने झोला व जेब भरने में ज्यादा मसगुल रहते हैं। आज वो सत्ता में बैठ कर क्या निती क्या अनिती वह व्यक्ति अपने आप को राजा समझने लगते है और हर वो बुरे काम करते हैं अपनी सत्ता की साख बनाये रखने के लिए अपना खुद का सामराज्य स्थापित करने के लिए भी वह नित प्रयास करता ही रहता और वह अपनी भुख मिटाने के लिए हर तरह के हतकंडे अपना कर चाहे उसे किसी का गला तक काटना भी पड़ीं तो वह पिछे
  नही हटता है , न तो देश व समाज कि चिन्ता है उसे और ना  ही किसी और की वह बस पैसा कमाना चाहता है और अपने लिए हर सुख सुविधा बटोरता जाता है और ऊल जुलूल हरकते कर के जुमलेबाजी मे पुरा डीग्री हासिल कर देश व समाज को गर्त मे ढकेल देता है। 
             और खुद की जान पे बन आति है तो वह अपने पालतु कुछ चापलुस व गिदड़ जैसे लोगो को साथ रख कर वह सत्ता के मद में चुर हो कर एक पागल हाथी के भांती अपने जीवन को काल के जाल मेँ समाता जाता है। वह देश काे भुखमरी, अपात काल जैसे हालात पैदा करना,देश काे अशिक्षा के गर्त मे ढकेला जा रहा है,लचर व्यवस्था के चलते देश को अपाहीज बना कर रख देता है। आज देश हित मे अपने विचार व आगे रख कर
  छाेटाे सा योगदान इस समाज व समाज के ठेकेदारो के इरादाें काे निस्तानाबुत करने के जुगत में आज से ही कार्य करने हाेगे इन सब दलालों  हटा कर देश के उन्नतिशील,प्रगति शील, विचारो का हो ना बहुत आवश्यक्ता है।

बस इस आशा और विश्वास के साथ अपने विचार काे यही विराम देते हुए । इस कड़ी काे आगे और भी लेख लिखतें रहुँगा। गलतियो पे छमा चाहता हूँ।

सत्ता का सुख पाना है ताे, कराे कुछ काज ऐसा ।
सभी का भला हाे, सभी काे मिले न्याय ।।

                                                   देवनारायण साहू

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वक्त-वक्त की बात

                   

     
                वक्त -वक्त की बात

                                    देवनारायण साहू

(1) वक्त के बारिश से भिगता हर कोई, बस थोड़ा-थोड़ा । उस वक्त के इन्तजार में, यहां वहां ना जाने कहां।

(2) वक्त से अच्छा दोस्त कोई होता नहीं, हर भले बुरे रोज दिखाता। करता हर पल आगाह तुमको, संभल जा ओ नवजवान ।

(3) वक्त वो पुंजी है जिसको खर्च करने की जरूरत नहीं होती । पर वह पुंजी वक्त में ही काम आती, जब वक्त बुरा हो।

(4) वक्त चाबी है उस ताले की, जब तुम्हारे पास वक्त पे वक्त नहीं होता। हो कर भी नहीं होती उस वक्त प्राण शरीर में, जब वक्त पर रक्त ना मिले जिवन बचाने को।

(5) वक्त उस गाड़ी का पहिया है, जो कभी नहीं रूकता है। ना ही कभी पंचर होती ना ही, उसका हवा कम होता।

(6) प्राणी भी इस वक्त के खेल से ही जुड़ा है, कोई अपने प्राण बचाने के लिए लड़ता है, तो कोई अपने भुख मिटाने को लड़ता है।

(7) वक्त की रफ्तार इतनी तेज है, कि इसमें हर कोई निखर जाते हैं। और जब वक्त की आंधी चलतीं है तो, सब बिखर जाते हैं।

(8) वक्त से कभी कोई हिसाब नहीं छुपता, सबकी खबर है रखता। क्या राजा, क्या रंक सभी को हिसाब देना ही पड़ता ।

(9) वक्त की बात चली तो, वक्त ने याद दिलाया। करले भजन राम जी का, अन्त में पछताना पड़ेगा। 

(10) वक्त से पहले न ही वक्त के बाद,न हिरन की तेज़ी और न शेर की तेज़ी । वक्त के साथ-साथ सभी करते हैं अपने ज़िन्दगी का आग़ाज़।

(11) वक हर व्यक्ति का विधाता होता है, वक्त में किया गया कार्य उत्तम, बेवक्त किया गया कार्य परेशानी लाता है।

(12) रखो अपने स्वास्थ्य का खयाल, रहोगे सुखी जीवन होगा खुशहाल। निरोगी काया तो, निरोगी जीवन पाया।

(13) वक्त के उड़ान भर के देखो, उड़ने में मज़ा है। नहीं करोगे वक्त पे कार्य तो यही वक्त की सज़ा है।

(14) वक्त का तकाजा है प्यारे, वक़्त सिखाता  जिंदगी को आशा पर जीवन यापन करने की विधा । नहीं तो पहले मज़ा, फिर बाद में सज़ा।

(15) वक्त वह शक्ति है, जो सभी रहते इसके अधीन । बिना वक्त के ना आते पेड़ों पर फुल।

(16) वक्त ही आशा अभिलाषा है, अभिनंदन हर वक्त के सिकंदर को, जो जिंदगी में कुछ भी कर जाने की बात कहता है।

(17) वक्त ने बंदर को ईन्शान बनाया, और वही ईन्शान ने बंदर को नचाया। अपने पापी पेट के खातिर उसके ज़िन्दगी को खेल बनाया।

(18) वक्त एक अनसुलझा रहस्य है, जो समझ गया वह होशियार। बाक़ी जो समझने में लगें वो नवाचार।
(19) वक्त ने हर लम्हा याद दिलाया, जो कर लो, चलेगा तो बस मेंरी चाल।  चाहे एक पत्ता ही क्यो ना हो या फिर हो कोई थानेदार।

(20) वक के आगे घुटने टेक दिए, उन लोगों ने जिन्होंने अपने वतन को बेच खाया। संभल जा ऐ कांफिर, क्योंकि वक्त ने जब अपना वक्त बदला तो प्रलय आया।

नोट - आप सभी मित्रों से विनम्र आशा व विश्वास है कि गलतीयों पर छमा करें व और भी रचना करने को प्रेरित करें । धन्यवाद !

                                   देवनारायण साहू

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छत्तीसगढ़ी गीत

(3)               ( छत्तीसगढ़ी - गीत )
             !! काबर जोड़े मया के बंधना !!                                                       देवनारायण साहू
(1) मोर मयारु, मोर जहुरिया, काबर जोड़े मया के बंधना । तै जोड़े काबर मया के बंधना।।

(2) तोर अगोरा मा दिन हा पहागें, तोर सुरता मा रद्दा-बाट घलो भुलागे। संगवारी ला घेरी-बेरी, पुछत रहिथो तोर हालचाल।।

(3) ते मोला छोड़ के का गेस, लागिस परान छुटगें। तोरे बर मै होके तैयार, का पाउंडर,का किरीम सबों रिसागें।।

(4) मया के बंधन मा बांध के, छोड़े काबर तै तोड़े काबर मोर मया ला। फुल पतरी मन घलो पुछथे कहागे तोर संगवारी हा ।।

(5) पहाति मुधरा ले तोरेच सुरता सताथे, का करो समझ नहीं आवय। काबर जोड़े तै मया के बंधना।।

(6) तोर चहरा आंखी मा झुलय, रथस मोर मन मा। जबले मिले हस तै, अमवा के निचे बाड़ी के पीछे।।

(7) रिसागे मोर संगी साथी, अऊ, मोर जोड़ी दार हा। का बानी लगाये मोर बर, ईमान से कहात हो।।

(8) जैसे जल बिन मछली, वैसे अन्तस होथे पिरा मोरो । काबर जोड़े तै मया के बंधना.... ।।

(9) मया ला मोर तै मारे ठोकर, काबर तै बता ।
का बाबु अऊ समाज ला, डरावत हस मोला बता।।

(10) सोचे रेहेव रबो दुनो, ददा-दाई के छांव मा ।
तोड़े तै बंधना मया के, कार जोड़ेस तै मया के बंधना।।

                                           देवनारायण साहू

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छत्तीसगढ़ी रचना - रक्षाबंधन


            छत्तीसगढ़ी रचना (रक्षाबंधन)
              
    ‌                                         देवनारायण साहू

(1) तिहार हरे पीरित अऊ मया के ,बंधना हे दो   दिल के। करो सब झन सबों ला राम-राम ।।

(2) बंधन हे ता ऐ रिश्ता हे, नो हरें कोनो अईसे- वईसे। बाबु-दाई के ये हा चिरई फुल आये।

(3) सबों नोनी, बाबू के तिहार हरें, आथे साल मां एक बार जी। करथे रक्षा हर नोनी-बाबू, अपन अपन बहिनी भाई के।

(4) हावय बड़ सुग्घर ये तिहार के मान,चाहे कोई कहूं डहार रहे। बहन के खातिर आथे शहर ले, अऊ शहर ले जाथे गांव मा जी।।

(5) अईसे बंधन हे रक्षा के जो बिछुडे़, ले नई बिछुड़े सके। प्यार के बंधना नित हर बेरा,रहो हमेशा जुड़ मिल के जी।।

(6) नोनी के हांसी मा बाबू के प्रिंत के बंधना, ये लागथे तिहार सरिक जी। ऐकर ले बड़ के नई हाबे,प्यार के मिशाल जी।।

(7) सुंदर, सुग्घर, मया के बंधन, करबे झन कोनो ला नाराज़। नहीते जईसे रस्सी मा गांठ पड़े मा जोड़े  नई जा सके।।

(8) ईश्वर के आशिर्वाद हरे हर नोनी-बाबू हा, येला मत रिशावन देवव जी। ये तो तुहर बगिया के दो फुल आये मोर जोड़ी दार ।।

(9) रक्षा के वचन के खातिर भाई हा वचनबद्ध हे, करही सबों के रक्षा । करबे रक्षा ता रही तोर तिर मा, नई ते चल देही छोड़ के जी ।।

(10) रक्षाबंधन तिहार प्यार अऊ दुलार के, मया के बंधना हावे जी। नोनी बाबू के हांसी ठिठोली हा, हाबे दाई बाबू के तिहार जी।।

‌                                           देवनारायण साहू
        Email id -sahudev72@gmail.com

छत्तीसगढ़ी रचना (भाषा)


              (रचना - छत्तीसगढ़ी भाषा)                                                        देवनारायण साहू

हावे हमर भाषा सुघर ,ऐकर ले बड़ के कोनों नई हे । महिमा है अपार, नवा युग के नवा बछर के।

हमर भाषा ला जतका जानबे,ओतका मजा आही
जतका सरल सुग्घर मोर भाखा हे,ओतका मोर पियार हे।

छत्तीसगढ़ के हे ईही निशान,भाषा हे सरल सुजान
तेकर सेती  ईहा निकले,हे महादेवी वर्मा।

हमर भाषा मां सुरज के लाली कस, चंदा घलो हे मस्त। काबर कोनो करा जान ,जब ईही में हे सब साथ।

 भाखा हे छत्तीसगढ़ी, जानथे सबो जहुरिया।
 ईला फैलाये बर, चलो करथन ईखर गोठ बात जी।

भाषा हमर अईसे ऐला जाने बर दुरहीया ले आथे,  शोध करें बर। अजब-गजब, सुन्दर हमर छ.ग. भाखा।


                                          देवनारायण साहू
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(छत्तीसगढ़ी -सुन ले माेर जाेड़ीदार)


                     

 (छत्तीसगढ़ी -सुन ले माेर जाेड़ीदार) 
                                                                                                                     देवनारायण साहू
(1) रहिबाे जुर मिल के  ताेर दुनाे  यार, का हे  विचार सुन ताे जाेड़ी दार ।
     मया के बधना  म बधाये हाबन, जईसे चंदा संग चादनी ।

(2)  आगना मा चिरई फूल जईसे , ताेर बेनी मा गजरा के फूल।
      महकत हे माेर ताेर  जिवन मा फूले फूल ।
(3)  आथे याद ताेर मीठ मीठ बाेली, तय गाेठियाथस  सिरताेन गज़ब के जी।
       लबारी नई मारत हाे , बढ़ गजब हे ताेर माेर जाेड़ी ।

(4)  रखबे सुरता माेर प्रित के जाेड़ी दार, हाे जाही गऊना ताेर माेर जाेड़ी दार ।
      ददा दाई के कहना ला मान, झटकुन करले  बिहाव माेर जाेड़ी दार ।

(5)  बनाबाे एक ठन घाेसला जेमे रही हमर प्रेम के निसानी, अऊ रखबाे आनी बानी के खिलाैना जी।
       राेज गाबो चंदा के लाेरी गीत ला, अऊ ताेर माेर प्रेम गीत ला सुनाबाे वाेला जी ।
                                                                                                                    देवनारायण साहू

एक ठन चिटरा (कविता)

  

(1)  एक ठीन नान कुन चिटरा , आथे चुपे-चाप
       झटकुन ऐती ले ओती कोन जनी काबर ।
(2) आथे हमरो दुवारी, का जनी काला खोजत,
      छानी ले, रुख राई ले, पठेरा में खोजत खोजत । 
 (3) मीठ मीठ अमरुद अऊ दर्मी ला खायेस तै चुहक के,               छोड़ देस मोर बर फोकला ला ।
(4) आथस बिहनिया ले खोजे बर किसम-किसम के खजानी,       आथे घलो तोर संगवारी।
(5) हस तै संगवारी मोर, मन ला गज़ब भाथस। तोर मोहिनी          कस रंग रुप गज़ब लागथे  मोला।
     एक ठन चिटरा आथे मोर अंगना मा ।
(6) हावय तोर ठऊर कोन ढहार कोन जनी, तभो ले सबों
      मनखे मन ला गजब भातस ।
(7) तोर देह के रचना बड़ निक लागथे, परमात्मा ह तोला
      बड़ फुर्सत मं बनाये हावय जी।
(8) तोला बड़ भाथे फल्ली ह जी, ना-नुकुर नहीं करस तै
      तोला जो मिलथे वोला तै खा लेथस ।
 (9) तोर मुहु मां कतका सारा खाना आते जी नानकुन तोर            मुहु, अऊ तोर शरीर घलो नानकुन।