छत्तीसगढ़ी रचना - रक्षाबंधन


            छत्तीसगढ़ी रचना (रक्षाबंधन)
              
    ‌                                         देवनारायण साहू

(1) तिहार हरे पीरित अऊ मया के ,बंधना हे दो   दिल के। करो सब झन सबों ला राम-राम ।।

(2) बंधन हे ता ऐ रिश्ता हे, नो हरें कोनो अईसे- वईसे। बाबु-दाई के ये हा चिरई फुल आये।

(3) सबों नोनी, बाबू के तिहार हरें, आथे साल मां एक बार जी। करथे रक्षा हर नोनी-बाबू, अपन अपन बहिनी भाई के।

(4) हावय बड़ सुग्घर ये तिहार के मान,चाहे कोई कहूं डहार रहे। बहन के खातिर आथे शहर ले, अऊ शहर ले जाथे गांव मा जी।।

(5) अईसे बंधन हे रक्षा के जो बिछुडे़, ले नई बिछुड़े सके। प्यार के बंधना नित हर बेरा,रहो हमेशा जुड़ मिल के जी।।

(6) नोनी के हांसी मा बाबू के प्रिंत के बंधना, ये लागथे तिहार सरिक जी। ऐकर ले बड़ के नई हाबे,प्यार के मिशाल जी।।

(7) सुंदर, सुग्घर, मया के बंधन, करबे झन कोनो ला नाराज़। नहीते जईसे रस्सी मा गांठ पड़े मा जोड़े  नई जा सके।।

(8) ईश्वर के आशिर्वाद हरे हर नोनी-बाबू हा, येला मत रिशावन देवव जी। ये तो तुहर बगिया के दो फुल आये मोर जोड़ी दार ।।

(9) रक्षा के वचन के खातिर भाई हा वचनबद्ध हे, करही सबों के रक्षा । करबे रक्षा ता रही तोर तिर मा, नई ते चल देही छोड़ के जी ।।

(10) रक्षाबंधन तिहार प्यार अऊ दुलार के, मया के बंधना हावे जी। नोनी बाबू के हांसी ठिठोली हा, हाबे दाई बाबू के तिहार जी।।

‌                                           देवनारायण साहू
        Email id -sahudev72@gmail.com

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