वक्त-वक्त की बात

                   

     
                वक्त -वक्त की बात

                                    देवनारायण साहू

(1) वक्त के बारिश से भिगता हर कोई, बस थोड़ा-थोड़ा । उस वक्त के इन्तजार में, यहां वहां ना जाने कहां।

(2) वक्त से अच्छा दोस्त कोई होता नहीं, हर भले बुरे रोज दिखाता। करता हर पल आगाह तुमको, संभल जा ओ नवजवान ।

(3) वक्त वो पुंजी है जिसको खर्च करने की जरूरत नहीं होती । पर वह पुंजी वक्त में ही काम आती, जब वक्त बुरा हो।

(4) वक्त चाबी है उस ताले की, जब तुम्हारे पास वक्त पे वक्त नहीं होता। हो कर भी नहीं होती उस वक्त प्राण शरीर में, जब वक्त पर रक्त ना मिले जिवन बचाने को।

(5) वक्त उस गाड़ी का पहिया है, जो कभी नहीं रूकता है। ना ही कभी पंचर होती ना ही, उसका हवा कम होता।

(6) प्राणी भी इस वक्त के खेल से ही जुड़ा है, कोई अपने प्राण बचाने के लिए लड़ता है, तो कोई अपने भुख मिटाने को लड़ता है।

(7) वक्त की रफ्तार इतनी तेज है, कि इसमें हर कोई निखर जाते हैं। और जब वक्त की आंधी चलतीं है तो, सब बिखर जाते हैं।

(8) वक्त से कभी कोई हिसाब नहीं छुपता, सबकी खबर है रखता। क्या राजा, क्या रंक सभी को हिसाब देना ही पड़ता ।

(9) वक्त की बात चली तो, वक्त ने याद दिलाया। करले भजन राम जी का, अन्त में पछताना पड़ेगा। 

(10) वक्त से पहले न ही वक्त के बाद,न हिरन की तेज़ी और न शेर की तेज़ी । वक्त के साथ-साथ सभी करते हैं अपने ज़िन्दगी का आग़ाज़।

(11) वक हर व्यक्ति का विधाता होता है, वक्त में किया गया कार्य उत्तम, बेवक्त किया गया कार्य परेशानी लाता है।

(12) रखो अपने स्वास्थ्य का खयाल, रहोगे सुखी जीवन होगा खुशहाल। निरोगी काया तो, निरोगी जीवन पाया।

(13) वक्त के उड़ान भर के देखो, उड़ने में मज़ा है। नहीं करोगे वक्त पे कार्य तो यही वक्त की सज़ा है।

(14) वक्त का तकाजा है प्यारे, वक़्त सिखाता  जिंदगी को आशा पर जीवन यापन करने की विधा । नहीं तो पहले मज़ा, फिर बाद में सज़ा।

(15) वक्त वह शक्ति है, जो सभी रहते इसके अधीन । बिना वक्त के ना आते पेड़ों पर फुल।

(16) वक्त ही आशा अभिलाषा है, अभिनंदन हर वक्त के सिकंदर को, जो जिंदगी में कुछ भी कर जाने की बात कहता है।

(17) वक्त ने बंदर को ईन्शान बनाया, और वही ईन्शान ने बंदर को नचाया। अपने पापी पेट के खातिर उसके ज़िन्दगी को खेल बनाया।

(18) वक्त एक अनसुलझा रहस्य है, जो समझ गया वह होशियार। बाक़ी जो समझने में लगें वो नवाचार।
(19) वक्त ने हर लम्हा याद दिलाया, जो कर लो, चलेगा तो बस मेंरी चाल।  चाहे एक पत्ता ही क्यो ना हो या फिर हो कोई थानेदार।

(20) वक के आगे घुटने टेक दिए, उन लोगों ने जिन्होंने अपने वतन को बेच खाया। संभल जा ऐ कांफिर, क्योंकि वक्त ने जब अपना वक्त बदला तो प्रलय आया।

नोट - आप सभी मित्रों से विनम्र आशा व विश्वास है कि गलतीयों पर छमा करें व और भी रचना करने को प्रेरित करें । धन्यवाद !

                                   देवनारायण साहू

----------------------(DDDD)------------------

छत्तीसगढ़ी गीत

(3)               ( छत्तीसगढ़ी - गीत )
             !! काबर जोड़े मया के बंधना !!                                                       देवनारायण साहू
(1) मोर मयारु, मोर जहुरिया, काबर जोड़े मया के बंधना । तै जोड़े काबर मया के बंधना।।

(2) तोर अगोरा मा दिन हा पहागें, तोर सुरता मा रद्दा-बाट घलो भुलागे। संगवारी ला घेरी-बेरी, पुछत रहिथो तोर हालचाल।।

(3) ते मोला छोड़ के का गेस, लागिस परान छुटगें। तोरे बर मै होके तैयार, का पाउंडर,का किरीम सबों रिसागें।।

(4) मया के बंधन मा बांध के, छोड़े काबर तै तोड़े काबर मोर मया ला। फुल पतरी मन घलो पुछथे कहागे तोर संगवारी हा ।।

(5) पहाति मुधरा ले तोरेच सुरता सताथे, का करो समझ नहीं आवय। काबर जोड़े तै मया के बंधना।।

(6) तोर चहरा आंखी मा झुलय, रथस मोर मन मा। जबले मिले हस तै, अमवा के निचे बाड़ी के पीछे।।

(7) रिसागे मोर संगी साथी, अऊ, मोर जोड़ी दार हा। का बानी लगाये मोर बर, ईमान से कहात हो।।

(8) जैसे जल बिन मछली, वैसे अन्तस होथे पिरा मोरो । काबर जोड़े तै मया के बंधना.... ।।

(9) मया ला मोर तै मारे ठोकर, काबर तै बता ।
का बाबु अऊ समाज ला, डरावत हस मोला बता।।

(10) सोचे रेहेव रबो दुनो, ददा-दाई के छांव मा ।
तोड़े तै बंधना मया के, कार जोड़ेस तै मया के बंधना।।

                                           देवनारायण साहू

============(D)===============

छत्तीसगढ़ी रचना - रक्षाबंधन


            छत्तीसगढ़ी रचना (रक्षाबंधन)
              
    ‌                                         देवनारायण साहू

(1) तिहार हरे पीरित अऊ मया के ,बंधना हे दो   दिल के। करो सब झन सबों ला राम-राम ।।

(2) बंधन हे ता ऐ रिश्ता हे, नो हरें कोनो अईसे- वईसे। बाबु-दाई के ये हा चिरई फुल आये।

(3) सबों नोनी, बाबू के तिहार हरें, आथे साल मां एक बार जी। करथे रक्षा हर नोनी-बाबू, अपन अपन बहिनी भाई के।

(4) हावय बड़ सुग्घर ये तिहार के मान,चाहे कोई कहूं डहार रहे। बहन के खातिर आथे शहर ले, अऊ शहर ले जाथे गांव मा जी।।

(5) अईसे बंधन हे रक्षा के जो बिछुडे़, ले नई बिछुड़े सके। प्यार के बंधना नित हर बेरा,रहो हमेशा जुड़ मिल के जी।।

(6) नोनी के हांसी मा बाबू के प्रिंत के बंधना, ये लागथे तिहार सरिक जी। ऐकर ले बड़ के नई हाबे,प्यार के मिशाल जी।।

(7) सुंदर, सुग्घर, मया के बंधन, करबे झन कोनो ला नाराज़। नहीते जईसे रस्सी मा गांठ पड़े मा जोड़े  नई जा सके।।

(8) ईश्वर के आशिर्वाद हरे हर नोनी-बाबू हा, येला मत रिशावन देवव जी। ये तो तुहर बगिया के दो फुल आये मोर जोड़ी दार ।।

(9) रक्षा के वचन के खातिर भाई हा वचनबद्ध हे, करही सबों के रक्षा । करबे रक्षा ता रही तोर तिर मा, नई ते चल देही छोड़ के जी ।।

(10) रक्षाबंधन तिहार प्यार अऊ दुलार के, मया के बंधना हावे जी। नोनी बाबू के हांसी ठिठोली हा, हाबे दाई बाबू के तिहार जी।।

‌                                           देवनारायण साहू
        Email id -sahudev72@gmail.com

छत्तीसगढ़ी रचना (भाषा)


              (रचना - छत्तीसगढ़ी भाषा)                                                        देवनारायण साहू

हावे हमर भाषा सुघर ,ऐकर ले बड़ के कोनों नई हे । महिमा है अपार, नवा युग के नवा बछर के।

हमर भाषा ला जतका जानबे,ओतका मजा आही
जतका सरल सुग्घर मोर भाखा हे,ओतका मोर पियार हे।

छत्तीसगढ़ के हे ईही निशान,भाषा हे सरल सुजान
तेकर सेती  ईहा निकले,हे महादेवी वर्मा।

हमर भाषा मां सुरज के लाली कस, चंदा घलो हे मस्त। काबर कोनो करा जान ,जब ईही में हे सब साथ।

 भाखा हे छत्तीसगढ़ी, जानथे सबो जहुरिया।
 ईला फैलाये बर, चलो करथन ईखर गोठ बात जी।

भाषा हमर अईसे ऐला जाने बर दुरहीया ले आथे,  शोध करें बर। अजब-गजब, सुन्दर हमर छ.ग. भाखा।


                                          देवनारायण साहू
        -------------------------##----------------

(छत्तीसगढ़ी -सुन ले माेर जाेड़ीदार)


                     

 (छत्तीसगढ़ी -सुन ले माेर जाेड़ीदार) 
                                                                                                                     देवनारायण साहू
(1) रहिबाे जुर मिल के  ताेर दुनाे  यार, का हे  विचार सुन ताे जाेड़ी दार ।
     मया के बधना  म बधाये हाबन, जईसे चंदा संग चादनी ।

(2)  आगना मा चिरई फूल जईसे , ताेर बेनी मा गजरा के फूल।
      महकत हे माेर ताेर  जिवन मा फूले फूल ।
(3)  आथे याद ताेर मीठ मीठ बाेली, तय गाेठियाथस  सिरताेन गज़ब के जी।
       लबारी नई मारत हाे , बढ़ गजब हे ताेर माेर जाेड़ी ।

(4)  रखबे सुरता माेर प्रित के जाेड़ी दार, हाे जाही गऊना ताेर माेर जाेड़ी दार ।
      ददा दाई के कहना ला मान, झटकुन करले  बिहाव माेर जाेड़ी दार ।

(5)  बनाबाे एक ठन घाेसला जेमे रही हमर प्रेम के निसानी, अऊ रखबाे आनी बानी के खिलाैना जी।
       राेज गाबो चंदा के लाेरी गीत ला, अऊ ताेर माेर प्रेम गीत ला सुनाबाे वाेला जी ।
                                                                                                                    देवनारायण साहू