कुछ नजराें से पुछाें
रचना - कुछ नजराें से पुछाें।
देवनारायण साहू |
कुछ नजराें से पुछ, क्या बस देखने के लिए बनी है यें।
नजराें काे अच्छा देखने की, आदत ताे डालाें।।
उन भिगी पलकाें से भी कुछ पुछाें, क्याे है नम ।
किसी के बेबसी पें, पुछाें ताे जरा क्याे है गम ।।
जब से इस दुनिया में आयें है, बस देख रहे हैं हम।
और सभी अपनी नजराें से, इस तरह टकटकी लगायें ।।
किसी हालात के नजाराें से, ताे कभी सामने पडे हजाराें से।
पता नहीं चलता किसकी, नजरें कब दगा दे जायें ।।
पल भर की ये दुनिया, नजराें में महज चमकती हुई ।
पल भर में दूर हाे जाती ये दुनिया, उन चंद निगाहाें से।
कभी पल भर बदलते, नजराें से नजराें का पैमाना।
क्या कभी सिताराें नें मेहसूस किया ,जमीं के नजाराें काे।।
नजराें में हाेता है ख्वाब जरूर जिंदा,बस अमल में लाने की जरूरत है |
सभी पुरी हाे ख्वाब,ये भी मुमकिन नही।।
उठी नजराें में तम्मनाऔं के, चिगांरी यू कुछ इस तरह|
फना हाे गयी पल भर में, सारे शहर के शहर ||
चुन चुन के जिन नजराें ने, इकट्ठा किया था तिनका |
अपने आशियाने बनाने के लिए, उसे कुछ नजराें ने ही तबाह कर दिया ||
उन चंद निगाहाें से कभी, कर लेना ईसाराें में बात |
क्या पता कल रहें ना रहें, फिर मिले ना मिलें ||
स्वरचित रचना - देवनारायण साहू
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मै देवनारायण साहू अपने काम काे गंभीरता से लेता हू और किसी भी काम काे लगन से करना मेरा पेशा है । हमारा एक दुकान है वह दिनेश प्रिंटर्स नाम से रायपुर में है । न्यू थिंक नाम से ब्लाग है ।
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